पाठ्यक्रम: जीएस-2/ शासन व्यवस्था एवं राजनीति
सन्दर्भ
- उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 498ए (अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 85 एवं 86) के अंतर्गत घरेलू क्रूरता का अपराध उन महिलाओं पर भी लागू होगा जो ऐसे लिव-इन रिलेशनशिप में हैं, जो “विवाह के स्वरूप वाले संबंध” हैं।
पृष्ठभूमि
- भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के तहत पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा किसी महिला के साथ क्रूरता करने पर दंड का प्रावधान है।
- चूँकि इस प्रावधान में स्पष्ट रूप से “पति” शब्द का प्रयोग किया गया है, इसलिए इसका प्रयोग परंपरागत रूप से केवल विधिक रूप से वैध विवाहों तक सीमित था।
- समय के साथ उच्चतम न्यायालय ने इसकी व्याख्या का विस्तार करते हुए ऐसे पुरुषों को भी इसके दायरे में शामिल किया, जिन्होंने किसी महिला को ऐसे विवाह में प्रवेश करने के लिए प्रेरित किया जो विधिक रूप से शून्य (Void) या शून्यकरणीय (Voidable) था।
- उदाहरण: पूर्व से विद्यमान विवाह को छिपाना। न्यायालय ने कहा कि ऐसे पुरुष यह दावा नहीं कर सकते कि वे “पति” नहीं हैं और इस आधार पर क्रूरता के अभियोजन से बच नहीं सकते।
विस्तार के पक्ष में तर्क
- प्रगतिशील न्यायिक व्याख्या: यह बदलती सामाजिक परिस्थितियों के अनुरूप कानून की उद्देश्यपूर्ण व्याख्या करने तथा कमजोर वर्गों को संरक्षण देने के प्रति न्यायपालिका की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।
- पीड़ित-केंद्रित दृष्टिकोण: यह विवाह की कानूनी स्थिति के बजाय घरेलू संबंध में क्रूरता की उपस्थिति को महत्व देता है।
- वास्तविक समानता को बढ़ावा: वैवाहिक स्थिति की परवाह किए बिना समान घरेलू संबंधों में रहने वाली महिलाओं को कानून के तहत समान संरक्षण प्रदान करता है।
- संवैधानिक प्रावधान: यह निर्णय संविधान के अनुच्छेद 14, 15(3) और 21 के अनुरूप है, जो कानून के समक्ष समानता, महिलाओं एवं बच्चों के लिए विशेष प्रावधान तथा जीवन, गरिमा, निजता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी देते हैं।
विस्तार के विरोध में तर्क
- न्यायिक अतिक्रमण: यह तर्क दिया जाता है कि विधि के शब्दों से परे जाकर आपराधिक कानून का दायरा बढ़ाना न्यायपालिका के बजाय संसद के विधायी क्षेत्राधिकार का विषय है।
- वैधानिक परिभाषा का अभाव: कानून में “विवाह के स्वरूप वाला संबंध” की स्पष्ट परिभाषा नहीं है, जिससे कानूनी अनिश्चितता उत्पन्न होती है।
उच्चतम न्यायालय के प्रमुख निर्णय
- डी. वेलुसामी बनाम डी. पैचैयम्मल (2010): उच्चतम न्यायालय ने यह निर्धारित करने के लिए मानदंड तय किए कि कब किसी सहजीवन संबंध को “विवाह के स्वरूप वाला संबंध” माना जा सकता है।
- इंद्रा शर्मा बनाम वी.के.वी. शर्मा (2013): न्यायालय ने विवाह-सदृश संबंध और सामान्य सहवास के बीच अंतर स्पष्ट करने वाले विभिन्न कारकों का उल्लेख किया तथा माना कि पात्र महिलाओं को कानूनी संरक्षण मिलना चाहिए।
- ललिता टोप्पो बनाम झारखंड राज्य (2018): उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि सहजीवन संबंधों में रहने वाली महिलाएँ महिलाओं का घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम, 2005 के अंतर्गत राहत प्राप्त करने की अधिकारिणी हैं।
- नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ (2018): न्यायालय ने गरिमा, स्वायत्तता, निजता और व्यक्तिगत चयन जैसे संवैधानिक मूल्यों को मान्यता देते हुए कहा कि बदलते सामाजिक मानकों के अनुरूप कानून की व्याख्या भी विकसित होनी चाहिए।
आगे की राह
- संसद को “विवाह के स्वरूप वाले संबंध” की स्पष्ट वैधानिक परिभाषा प्रदान करने वाला विधिक ढाँचा तैयार करने पर विचार करना चाहिए।
- पात्र संबंधों के निर्धारण में एकरूपता सुनिश्चित करने के लिए समान न्यायिक दिशानिर्देश विकसित किए जाने चाहिए।
- महिलाओं में कानूनी जागरूकता बढ़ाई जानी चाहिए ताकि वे सहजीवन संबंधों में उपलब्ध आपराधिक एवं दीवानी उपचारों से परिचित हो सकें।
- कानून के दुरुपयोग को रोकते हुए इन संरक्षण उपायों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए कानून प्रवर्तन एजेंसियों को उपयुक्त प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।
स्रोत: TH